ईरान पर नई जंग की चेतावनी के बीच ट्रंप को एक्सपर्ट की नसीहत, बोले- ‘अमेरिका का हाल वियतनाम जैसा हो सकता है’

वाशिंगटन
मिडिल ईस्ट में शांति की कोई किरण नजर नहीं आ रही है. उल्टा हालात दिन-प्रतिदिन बदतर होते जा रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर सबसे खतरनाक और बड़े हमले की खुली धमकी दे दी है. उन्होंने कहा है कि अगर ईरान गंभीर वार्ता नहीं करता तो अमेरिका पूरे दम के साथ हमला कर सकता है। 

यह धमकी ऐसे समय आई है जब जून में हुआ सीजफायर पहले ही टूट चुका है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर तनाव चरम पर पहुंच गया है. दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्ग को लेकर ईरान की धमकियों ने पूरा ग्लोबल इकोनॉमी को हिला दिया है। 

ट्रंप ने Axios को दिए इंटरव्यू में साफ कहा कि ईरान पर अभी तक पर्याप्त दबाव नहीं बना है. अमेरिकी सेना लगातार कई रातों से ईरानी सैन्य ठिकानों पर हमले कर रही है. इजरायल भी तैयार खड़ा है, हालांकि ट्रंप का कहना है कि फिलहाल उसे जरूरत नहीं पड़ेगी. तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई हैं, जो पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है। 

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ईरान पहले ही साफ कर चुका है कि उस पर दोबारा हमला हुआ तो वह सिर्फ अपने इलाके तक जवाब सीमित नहीं रखेगा. हाल के दिनों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए हमलों में कई अमेरिकी सैनिक घायल हुए हैं. वहीं, खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा भी अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। 

पश्चिम एशिया में फैल जाएगी ईरान की जंग
डेविड हर्स्ट का मानना है कि अमेरिका की सबसे बड़ी मुश्किल सिर्फ ईरान की सेना नहीं, बल्कि उसका 'असममित युद्ध' का मॉडल है. यानी ईरान ने खाड़ी के कई मुल्कों में शिया समूह स्थापित कर रखे हैं जिसे वो हथियार मुहैया कराता है. सस्ते ड्रोन, मिसाइलें और समुद्री मार्गों पर दबाव बनाकर ईरान अपेक्षाकृत कम लागत में अमेरिका और उसके सहयोगियों को बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है. यही वजह है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर जैसे अहम समुद्री रास्ते लगातार वैश्विक चिंता का कारण बने हुए हैं। 

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अगर यह जंग और बढ़ती है तो असर सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा. तेल की कीमतों, वैश्विक शिपिंग और दुनिया की सप्लाई चेन पर इसका सीधा असर पड़ सकता है. कई जहाज पहले ही अपने रूट बदल चुके हैं, जबकि ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ने लगी है। 

दूसरी तरफ, अमेरिका के भीतर भी इस युद्ध को लेकर समर्थन पहले जैसा नहीं दिख रहा. हालिया सर्वे बताते हैं कि बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिक इस संघर्ष को लंबा खींचने के पक्ष में नहीं हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा चला और अमेरिकी सैनिकों की मौत का आंकड़ा बढ़ा, तो इसका असर ट्रंप की घरेलू राजनीति पर भी पड़ सकता है। 

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अमेरिका का कैसे होगा वियतनाम जैसा हाल?
इसी संदर्भ में विशेषज्ञ वियतनाम युद्ध का उदाहरण देते हैं. उनका कहना है कि अमेरिका ने वियतनाम में भी शुरुआत में अपनी सैन्य ताकत पर भरोसा किया था, लेकिन धीरे-धीरे वह एक लंबे और महंगे युद्ध में फंस गया. आखिरकार सैन्य शक्ति के बावजूद उसे पीछे हटना पड़ा. विशेषज्ञों का तर्क है कि ईरान में भी ऐसा ही खतरा मौजूद है, क्योंकि यहां सिर्फ बमबारी से हालात नहीं बदलेंगे। 

यही वजह है कि कई रणनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर ट्रंप सैन्य दबाव के साथ-साथ कूटनीतिक रास्ते को पूरी तरह छोड़ देते हैं और जमीनी युद्ध की ओर बढ़ते हैं, तो यह संघर्ष अमेरिका के लिए महंगा, लंबा और राजनीतिक रूप से नुकसानदायक साबित हो सकता है. उनके मुताबिक, ईरान के साथ टकराव जितना आसान दिखाई देता है, असल में उतना ही मुश्किल और उलझा हुआ है। 

 

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